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अनुभूति में संतोष कुमार सिंह की रचनाएँ —

विज्ञान कविताओं में-
कार्य
आर्किमिडीज सिद्धान्त
उत्प्लावन बल
प्लावन का नियम
बल
गुरुत्व केन्द्र

गीतों में-
अपना छोटा गाँव रे
इस देश को उबारें
ऐसी हवा चले
गाँव की यादें
चलें यहाँ से दूर
जग यूँ दीख रहा
जा रहा था एक दिन
धरती स्वर्ग दिखाई दे
नारी जागरण गीत
फिर कैसे दूरी हो पाए
मन जुही सा
मीत मेरे
ये बादल क्यों रूठे हैं
रूठ गई मुस्कान
श्रमिक-शक्ति

सोचते ही सोचते

शिशु गीतों में-
डॉक्टर बंदर
भालू
सूरज
हिरण

संकलन में-
ममतामयी- माँ

खिलते हुए पलाश- टेसू दहकें दोपहर

  छह विज्ञान कविताएँ

१. गुरुत्व केन्द्र

जैसे गिरें नित्य फल अक्सर।
टूटा सेव गिरा झट भू पर।
उसे देख न्यूटन ने सोचा,
सेव टूट क्यों गया न ऊपर।।
कौतूहल का बढ़ गया बोझा।
सोच न पाए साधू-ओझा।
कोई शक्ति खींचती सबको,
न्यूटन ने हल यह था खोजा।।
न्यूटन ने बल भू में पाया।
बल का भी एक केन्द्र बताया।
'गुरुत्व केन्द्र' है वही, किन्तु बल,
"गुरुत्वाकर्षण" बल कहलाया।।

२. आर्किमिडीज का सिद्धान्त

कोई वस्तु पूर्ण या आंशिक,
द्रव में कभी डुबोई जाती।
होता यह आभास, भार में,
कमी बहुत है आ जाती।।

आर्किमिडीज सिध्दान्त यही है,
द्रव को वस्तु हटाए मोती।
वह आभासी कमी, हटाए,
द्रव के भार बराबर होती।।

३. प्लवन का नियम

प्लवन नियम में बल हों दो सर।
कार्य करें विपरीत परस्पर।।
वस्तु भार का लगता जोर।
गुरुत्वकेन्द्र पर नीचे की ओर।।
हटाया द्रव भी जोर लगाता।
ऊर्ध्वाधरत ऊपर धकियाता।।
वस्तुभार से प्लवन बल ज्यादा।
तभी वस्तु तैरे है राधा।।

४. उत्प्लावन बल

खाली डिब्बे, लकड़ी-गुटके।
जल में तैरें ये बेखटके।
कोई ऐसी शक्ति छुपी जल,
दे धक्का ऊपर जो पटके।।

द्रव के अन्दर हो उछाल बल,
नहीं बैठने देता जो तल।
ज्यादा होता वस्तु भार से,
कहें उसे उत्प्लावन बल।।


५. बल

ठहरे हुए पिंड को कोई, शक्ति किधर भी गति देती।
अथवा उसकी आकृति में, बदलाव जरा भी कर देती।
अथवा ना भी हो बदलाव, मगर रहता प्रयास हो,
वही शक्ति "भौतिक बल" है, नई कहानी लिख देती।।


६.कार्य

एक पिंड कोई निश्चल है।
लगा दिया फिर कोई बल है।।
बल की दिशा चले पिंड वह,
दुनिया में यह नियम अटल है।।
लगा हुआ बल जितना उस पर।
उतना गया पिंड है चल कर
"कार्य" जूल मे निकल जाएगा,
दूरी, बल का गुणा करो गर।।

११ जुलाई २०११

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