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कविताएँ
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खाने को नहीं देतीं,
न पहनने को,
सिर्फ़ सोच की खुराक दे जाती हैं।
हीनता
हर बार तोड़ा
हकीकत की खिड़की को,
सपनों के कमरे में,
खुद जाती है जो।
 
२४ दिसंबर २००४
 

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