अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

शुभ दीपावली

अनुभूति पर दीपावली कविताओं की तीसरा संग्रह
पहला संग्रह
ज्योति पर्व
दूसरा संग्रह दिए जलाओ

जंगल में दीवाली

जंगल में मन रही दिवाली
कितनी सुंदर बड़ी निराली।

शेरु राजा ने मांदों पर
टाँगी झालर दीप जलाए
और शेरनी ने भी सबको
खील-बताशे खूब खिलाए
हाथी दादा ने लड्डू की

पूरी थाली चट कर डाली।
जंगल में मन रही दिवाली।।

मीकू बंदर डाली पर चढ़
चला रहा देखो फुलझड़ियाँ
लोमड़ ने भोंदू की दुम में
बाँध जला दी बम की लड़ियाँ
भोंदू भागा फिरता डरकर

ढेंचू-ढेंचू देकर गाली।
जंगल में मन रही दिवाली।।

-निशेष जार
16 अक्तूबर 2006

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter