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औरत के क्षितिज से
औरत के क्षितिज से
आँचल में
चाँद-सी बिंदिया
झिलमिलाती है।
नदिया-सी
इठलाती है ज़िंदगी
उसकी रोटियों में बिलता है
श्रम ज़िंदगी का
वह भरपेट सोती
अपनी दुनिया को देखती है
उसका चाँद
और भी मुखर हो उठता है
औरत नियति-सी
ख़ामोश है
निहारती प्रारब्ध को।
–सुनीता ठाकुर