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अभिव्यक्ति  २५. ८. २००८

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मंडी चले कबीर

 

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कपड़ा बुनकर थैला लेकर
मंडी चले कबीर।

जोड़ रहे हैं रस्ते भर वे
लगे सूत का दाम।
ताना, बाना, और बुनाई
बीच कहाँ विश्राम।
कम से कम इतनी लागत
तो पाने हेतु अधीर।
मंडी चले कबीर।

माँस देखकर यहाँ कबीरों पर
मँडराती चील।
तैर नहीं सकते आगे है
शैवालों की झील।
आग नहीं, आँखों में तिरता
है चूल्हे का नीर।
मंडी चले कबीर।

कोई नहीं तिजोरी खोले
होती जाती शाम।
उन्हें पता है कब बेचेंगे
औने पौने दाम।
रोटी और नमक थैलों को
बाज़ारों को खीर।
मंडी चले कबीर।

- अवध बिहारी श्रीवास्तव

इस सप्ताह
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

गीतों में-
अवध बिहारी श्रीवास्तव

अंजुमन में-
अमर ज्योति 'नदीम' 

पुनर्पाठ में-
गिरिजाकुमार माथुर

छंदमुक्त में-
कृष्ण कुमार यादव

दिशांतर में-
ऑस्ट्रेलिया से प्रेम माथुर

पिछले सप्ताह
११ अगस्त २००८ के अंक में

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

संकलन में- मेरा भारत

काव्य संगम में- सात विभिन्न भाषाओं के प्रतिष्ठित कवियों की देशभक्ति रचनाएँ

उपहार में स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
लाल किले पर अमर तिरंगा

नई हवा में- राजश्री और शशिपाधा

हास्य व्यंग्य में- प्रकाश प्रलय

 अन्य पुराने अंक

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
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