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अभिव्यक्ति  

७. ९. २००९

अंजुमन । उपहार । काव्य संगम । गीत । गौरव ग्राम । गौरवग्रंथ । दोहे । पुराने अंक । संकलन । हाइकु
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एक गाथा का समापन

  साँझ को तन पर लपेटे
शोर साँसों में समेटे
काँस वन में मैं दिवस का
अकेलापन हूँ
एक गाथा का समापन हूँ!

छुओगे तो
आइने-सा
झनझना कर टूट जाऊँगा
सेंदुरी मंगल कलश-सा
धार में ही फूट जाऊँगा
मैं हवाओं की त्वचा का
खुरदुरापन हूँ!

धूप बुनकर
अग्नि गाछों पर-
दहकता
दिशाओं में
तप्त चंदन-सा महकता
नाग-पाशों से बिंधा
घायल हरापन हूँ!

मंत्र जल-सा
आंजुरी में
मत मुझे बाँधों
हो सके तो
बाँसुरी में दर्द-सा साधो
छंद की आवृत्तियों में
मैं नयापन हूँ!
 

- देवेन्द्र शर्मा इंद्र

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
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