पत्र व्यवहार का पता

अभिव्यक्ति तुक-कोश

१३. ५. २०१८

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आग का जंगल

 

 

दूब जिन्दा है
चिलचिलाती धूप में तपने

आग का जंगल 
दिखाता नदी तट पर नृत्य
पेड़ क्या पर्वत स्वयं ही
हैं पवन के भृत्य

तैरते हैं फुनगियों की आँख में
ठूँठ के सपने

दूब जिन्दा है
चिलचिलाती धूप में तपने

अनमनी हैं प्रात की पलकें
स्मरण कर दोपहर वाली छाँव
एक गरमीली उमस के ताल में
खड़ा है आकण्ठ डूबा गाँव
1
वक्त त्रैमासिकी मौसम दे चुका है
प्रेस में छपने
1
दूब जिन्दा है
चिलचिलाती धूप में तपने
1
- आचार्य गिरिमोहन गुरु

 

 


 

इस माह
ग्रीष्म महोत्सव के
अवसर पर

गीतों में-

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अनूप अशेष

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अश्विनी कुमार विष्णु

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आचार्य गिरिमोहन गुरु

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आभा सक्सेना दूनवी

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कल्पना मनोरमा

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कल्पना रामानी

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कुमार रवीन्द्र

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कृष्ण भारतीय

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गरिमा सक्सेना

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चन्द्रप्रकाश पाण्डे

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देवव्रत जोशी

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देवेन्द्र सफल

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प्रदीप शुक्ल

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बसंत कुमार शर्मा

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ब्रजनाथ श्रीवास्तव

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भावना तिवारी

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मधु शुक्ला

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मलखान सिंह सिसौदिया

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मानोशी चैटर्जी

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योगेन्द्र प्रताप मौर्य

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रंजन कुमार झा

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रंजना गुप्ता

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रमा प्रवीर वर्मा

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रविशंकर मिश्र रवि

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राकेश सुमन

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राजेन्द्र वर्मा

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राहुल शिवाय

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विनोद निगम

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शशिकांत गीते

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शशि पुरवार

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शिवानंद सिंह सहयोगी

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शीलेन्द्र सिंह चौहान

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सरस्वती माथुर

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सीमा अग्रवाल

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सुरेन्द्र कुमार शर्मा

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सुरेन्द्रपाल वैद्य

छंदमुक्त में-

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अजित कुमार

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अश्विन गांधी

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मधु संधु

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शैलेष वीर

छंदों में -

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ओमप्रकाश नौटियाल

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परमजीतकौर रीत

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संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग :
कल्पना रामानी