अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में अरुण मित्तल अद्भुत की रचनाएँ-

अंजुमन में--
अंधेरों में चमकता
कौन समझेगा
खुद से मिलकर
जो उजालों मे
तुम्हें झूठ से बहलाने में
सिर्फ और सिर्फ

हिसाब मत देना
 

 

तुम्हें झूठ से बहलाने में

तुम्हें झूठ से बहलाने में डर लगता है
पर सच तक भी तो जाने में डर लगता है

तुझसे दूर रहूँ ये मुझको नहीं गवारा
लेकिन तेरे पास आने में डर लगता है

जिसको खुद ही ठुकराया था मैंने इक दिन
उसको फिर से अपनाने में डर लगता है

पता है मुझको बात वो मेरी मानेगा ही
लेकिन दिल को समझाने में डर लगता है

टूट गया है उनसे रिश्ता ये भी सच है
पर यह खुद को बतलाने में डर लगता है

जिनकी क़समें तोड़ नहीं मैं सकता अद्भुत
हाँ उनकी क़समें खाने में डर लगता है

जनवरी २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।