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अनुभूति में गुलज़ार की रचनाएँ -

अंजुमन में-
इक नज़्म की चोरी
जिस्म
मुझे अफ़सोस है
वक्त
सादा कैनवस पे उभरते हैं बहुत से मंज़र

  इक नज़्म की चोरी

इक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने
यहीं पड़ी थी बालकनी में,
गोल तिपाई के ऊपर थी!
विस्की वाले ग्लास के नीचे रक्खी थी
शाम से बैठा,
नज़्म के हल्के-हल्के सिप मैं घोल रहा था होठों में,
शायद कोई फ़ोन आया था-
अंदर जा के, लौटा तो फिर नज़्म वहाँ से गायब थी।

अब्र के ऊपर नीचे देखा
सुर्ख़ शफ़क़ की जेब टटोली
झाँक कर देखा पार उफुक के
कहीं नज़र न आई, फिर वो नज़्म मुझे!

आधी रात आवाज़ सुनी, तो उठ के देखा
टाँग पे टाँग रखे, आकाश में
चाँद तरन्नुम में पढ़ पढ़ के
दुनिया को अपनी कहके नज़्म सुनाने बैठा था।

४ मई २००५

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