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अनुभूति में हरबंस सिंह अक्स की रचनाएँ-

अंजुमन में-
इश्क में फूल
चार क़तआत
देखने वालों
देखते ही देखते
बुतकदे में
 

 

कतआत -

१
आज मुरझा गए तो क्या गम है
हम शगुफ्ता गुलाब होते थे।
दिल की बातों में आ गए वरना
हम कहाँ यूं ख़राब होते थे।

२
ज़िंदगी के कुमारखाने में
देख तो क्या नसीब करता है
एक बनता है जब अमीर कोई
सैंकडों को गरीब करता है

३
नूर इक फैलता है धरती पर
फूल पाकीज़गी का खिलता है
पूरा आलम सँवर सँवर जाए
दिल से जब दिल कहीं भी मिलता है

४
बाप दादा भी झेलते गुज़रे
मैं भी गम ढो रहा हूँ कुछ ऐसे
एक मुफलिस के घर में पुश्तों तक
इक महाजन का क़र्ज़ हो जैसे

७ जुलाई २००८

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