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बारिशों में नहाना
मुझको खंजर
यार पुराने
यों ही उदास है दिल
वो नज़रों से

अंजुमन में-
आँखें पलकें गाल भिगोना
ख्वाब देखे थे
गुमसुम तनहा
जरा सी देर में
शजर पर एक ही पत्ता
सहमा सहमा

  शजर पर एक ही पत्ता

शजर पर एक ही पत्ता बचा है
हवा की आँख में चुभने लगा है

नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
समन्दर बारिशों में भीगता है

कभी जुगनू कभी तितली के पीछे
मेरा बचपन अभी तक भागता है

सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है

जवानी क्या मेरे बेटे पे आई
मेरी आँखों में आँखे डालता है

चलो हम भी किनारे बैठ जायें
ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है

२ नवंबर २००९

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