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अनुभूति में प्रमोद कुमार कुश तनहा की रचनाएँ-

नई ग़ज़लें-
आग अश्कों से लगा लेंगे
दरो दीवार की हद से निकल के
रात हमने नींद ली
हम ये समझे थे

अंजुमन में-
ग़म नहीं है
चांद की तलाश में
फिर वही तनहा सफ़र
बाज़ार चल रहा है
बेशक हुआ करे
सर आसमाँ पे रख
वो कहीं टकराएँ तो
सिर्फ़ हम थे
हम चल दिए

 

बाज़ार चल रहा है

बोली लगा रहे हैं, बाज़ार चल रहा है
हर सू इबादतों का व्यौपार चल रहा है

कुछ तोड़ने में माहिर कुछ टूटने को ज़िंदा
ये खेल है पुराना संसार चल रहा है

हम कत्ल हो चुके हैं दम छूटता नहीं है
क़ातिल है खूबसूरत दीदार चल रहा है

महफ़िल में आज दोनों ख़ामोश हैं, मगर कुछ
इस पार चल रहा है उस पार चल रहा है

'तनहा' की अंजुमन में आवाज़ कहकहों की
लगता है हादसों का तेहवार चल रहा है

१६ जुलाई २००६

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