अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में राजीव राय की रचनाएँ—

नई रचनाएँ-
ज़िंदगी आँच से
जिसने थामीं थीं
पूरी हो आखिर कैसे
ये जहाँ
हम उदास रहते हैं

अंजुमन में—
चाहा था जिसे हमने
पूछूँ मैं भला कैसे
बरसों निभाया
शाम से उदासी
हज़ारों नेकिया

  ज़िंदगी आँच से

ज़िंदगी आँच से तेरी पिघल गया हूँ मैं
कब तलक मोम-सा रहता, बदल गया हूँ मैं

लोग आये हैं मेरी क़ब्र पे सजदा करने
अब उन्हें कैसे बताऊँ कि गल गया हूँ मैं

वो तेरा देखना मुझको सरे महफ़िल ज़ालिम
अब मेरे बस में कुछ नहीं, मचल गया हूँ मैं

दिखाई रौशनी तुमने, बहुत हसीन मगर
हुआ ये देर से मालूम, जल गया हूँ मैं

ज़माना देख लिया और ज़माने का चलन
अब कोई पास न आएँ, सँभल गया हूँ मैं

३ मई २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter