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अनुभूति में श्यामसखा श्याम की रचनाएँ-
नई ग़ज़लें-
उसको अगर परखा नहीं होता
क्या करता
जब मैं छोटा बच्चा था
गूँगे का बयान
दर्द तो जीने नहीं देता मुझे
दिल नहीं करता
हम जैसे यारों से यारी
तेरे शहर में
वो तो जब भी ख़त लिखता है

अंजुमन में-
आस इक भी
खुद से जुदाई
हैं अभी आए

 

क्या करता

घर से बेघर था, क्या करता?
दुनिया का डर था, क्या करता?

जर्जर कश्ती टूटे चप्पू
चंचल सागर था, क्या करता?

सच कहकर भी मैं पछताया
खोया आदर था, क्या करता?

चंदा डूबा, तारे गायब
चलना शब भर था, क्या करता?

ठूँठ कहाँ था सबने मुझको
मौसम पतझर था, क्या करता?

खुद से भी तो छुप न सका वो
चर्चा घर-घर था क्या करता?

आखिर दिल मैं दे ही बैठा
बाँका दिलबर था, क्या करता?

ना थी धरती पाँव तले, ना
सर पर अबर था, क्या करता?

मेरा जीना मेरा मरना
तुम पर निर्भर था, क्या करता?

सारी उम्र पड़ा पछताना
भटका पल भर था, क्या करता?

बादल बिजली बरखा पानी
टूटा छप्पर था, क्या करता?

सब कुछ छोड़ चला आया मैं
रहना दूभर था, क्या करता?

थक कर लुट कर वापस लौटा
घर आख़िर घर था, क्या करता?

२३ जून २००८

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