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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ-

नए गीतों में-
कुशलता है
भटक गया तो
वह हथेली
क्षण का विछोह
क्षतिपूर्तियाँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतों में -
अब नहीं हो
असमय आए
इक तेरी चाहत में
उमर में डूब जाओ
एकांतवास

तपन न होती
तुम चाहो
प्रीत भरी हो
मन अजंता
मीरा हो पाती
मुझको पुकार
रिमझिम जैसी
लाज ना रहे

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप

 

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप

स्पन्दन बचा है अभी
कहीं, किन्हीं, लुके-छिपे संबंधों में

अन्न बचा है
अनायास भी मिल जाती हैं दावतें

ऋण है कि
बादलों को देखा नहीं तैरते जी-भर
बरस चुके कई-कई बार

क्षमा है कि-बेटियाँ
चुरा लेती है बाप की जवानी
उनकी राजी-खुशी

जोश है बचा
कि रीढ़ सूर्य के सात-सात घोड़ों की ऊर्जा से
खींच रही है गृहस्थी

कहीं एक कोने में बचे हैं दु:ख
जो तकियों से पहले लग जाते हैं सिरहाने
और नींद की अंधेरी घाटियों में
हाँकते रहते हैं स्वप्नों की रेवड़

पृथ्वी पर इन सबके चलते
बची है होने को दुर्घटना
प्रलय को न्योतते हुए
नहीं लजाएँगे अगली सदी तक हम।

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