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अनुभूति में अपर्णा मनोज की रचनाएँ

छंदमुक्त में-
आओ देखो
एक बार तुम भी
चाहूँ, फिर चाहूँ
जाओ देखो तो
तुम भी बुला लेना मुझे

 

चाहूँ, फिर चाहू

इस बार सोचा तुम्हे फिर से चाह कर देखूँ
ऐसे जैसे मैं रही हूँ सोलह वर्ष
और तुम उससे एक ज्यादा...

फिर चाहूँ
और दौडूँ तुम्हारे पीछे

भूल जाऊँ बीच में ये
ठिठकी रुकूँ
और सिर ऊँचा कर देखूँ
बादलों की नक्काशी किये आसमान को
देखने लगूँ तितलियों के निस्पृह पंख
बीन लूँ हरसिंगार की झड़ी पत्तियाँ
लाल फ्रॉक में।

फिर झाड़ भी दूँ हरी दूब पर
तुम्हारी मुस्कान के पीछे दौड़ते हुए सब ..
बदली बरस जाती है
बीन कर नदी की धार ज्यों।

२८ मार्च २०११

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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