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लिखना

लिखना
अपने को छीलना है
कि भीतर हवा के आने–जाने की
खिड़की तो निकल आए

लिखना
शब्द बीनना है
कि भीतरी रोशनी
दूसरों तक यों पहुँचे
कि भीतरी किवाड़ खोल दे

लिखना
एक उगना है
एक उगाना है
कि शब्द जहॅा पडे़
उग आयें हर ज़मीन में
पनप आयें रेगिस्तानों में भी
और खींच लायें पानियों को

लिखना आखिर
पानी तक पहुँचना है।

१० जनवरी २०११

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