अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में धीरेन्द्र प्रेमर्षि की रचनाएँ 

गीतों में
गीत एक संगीत का
दिल रेशम की चुनरी तो नहीं
नेह दीपक

संकलन में
गुच्छे भर अमलतास- जल रहा जिया

 

नेह दीपक

काँटों के पथ पर चल कर भी
हम फूल ही फूल खिलाएँगे
इस नेह–दीपक की लौ को
हम युग–युग तलक जिलाएँगे

छाए चाहें घटा घनेरी,
किरणों की हर बस्ती में
रहूँ चलाता बस पतवारें,
बैठ करम की कश्ती में
खत्म कभी ये हो न सफर,
चला करूँ बस निज पथ पर
घूँट ज़हर का भर कर भी,
अमृत ही तुझे पिलाएँ गे
इस नेह दीपक की लौ को
हम युग–युग तलक जिलाएँगे

रह कीचड़ में यह तन मैला
होता भी है तो हो जाए
स्व रक्षा में निज सुख का पथ
खोता भी है तो खो जाए
धरती नहीं तो घर ही क्या
पांव नहीं तो डगर ही क्या
हम खुद ही बनेंगे गंगोत्री
गंगा में न खुद को मिलाएँ गे
इस नेह दीपक की लौ को
हम युग–युग तलक जिलाएँगे

१६ फरवरी २००५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter