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अनुभूति में गिरीश बिल्लोरे ''मुकुल'' की कविताएँ—

क्षणिकाओं में-
चार क्षणिकाएँ

कविताओं में-
गीत गीले हुए
गुमशुदा मानसून
द्रोणाचार्य से-
दौर
प्राप्ति और प्रतीति
प्रिया तुम्हारी पैजन छम-छम
मन का पंछी
माँ

 

द्रोणाचार्य से-

द्रोण,
तुम अर्जुन के पायदान,
हो सकते हो।
दुर्योधन का अभिमान,
हो सकते हो?
किसी को कृतघ्न कह सकते हो।
''मुझे कदापि नहीं।''

द्रोण -
परोक्ष ही सही-
तुम्हारा आशीष मैं -
सब कुछ कर सकता हूँ।
एक ''कृतघ्नता'' को छोड़कर।

गुरुवर,
मुझे देखो-कथित शिष्यों में जोड़कर-
देखना- मैं खरा उतरूँगा-
एक बार- माँग लो- अगूँठा/हाथ/कुछ भी-
भले आज़माने को।
एक - अदद - ''कृतघ्नता'' को छोड़।

24 अप्रैल 2007

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