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अनुभूति में हिमांशु कुमार पांडेय की रचनाएँ-

कविताओं में-
क्रूर आलोचक
कहाँ कहाँ डोलूँगा
दुर्घटना
तुम्हारा स्पर्श
पहाड़ के उस पार
लंबा ख़त
मैंने कविता लिखी

  लम्बा खत

मैंने पढ़ा
तुम्हारा लम्बा खत

जैसे किसी सपने की परी को
सामने आ खड़े होने का निमंत्रण
या किसी नवोढ़ा पत्ती की रंजित देह को
न बदलने का नियंत्रण;
या फिर अपने कोमल पत्रों में सिमटी
कली को, न खिलने की पाबंदी
अथवा संभव करना सितारों और सूरज की
असंभव युगलबन्दी -

ऐसा विश्वास दिखा तुममें
ऐसी क्षमता दिखी
कि जहाँ न अक्षर थे
और न ही शब्द,
जहाँ न सम्बोधन था
और न ही संवाद-
लिखा तुमने एक लम्बा खत।

बरसते पानी से प्रवाह लेकर
पक्षियों के संवाद से संवाद लेकर
सतरंगी इन्द्रधनुष से सतरंगी छवि पाकर
खड़ी कर दी तुमने - एक आत्मा।

लिखते रहो ऐसे ही
आहट को टटोलते हुए,
देह नहीं
फूल नहीं
गंध को खंगालते हुए।

२९ सितंबर २००८

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