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अनुभूति में डॉ. जगदीश व्योम की रचनाएँ—

कविताओं में—
अक्षर
छंद
रात की मुट्ठी
सो गई है मनुजता की संवेदना
हे चिर अव्यय हे चिर नूतन

गीतों में—
आहत युगबोध के
इतने आरोप न थोपो
न जाने क्या होगा
पीपल की छाँव
बाज़ीगर बन गई व्यवस्था
हाइकु नवगीत

दोहों में—
ग्यारह दोहे

हाइकु में-
सात हाइकु

संकलन में—
तुम्हें नमन- किसकी है तस्वीर
नव वर्ष अभिनंदन-– दादी कहती हैं
हिंदी के 100 सर्वश्रेष्ठ प्रेमगीत- पिउ पिउ न पपिहरा बोल

 

हे चिर अव्यय! हे चिर नूतन!
(श्री सुमित्रानंदन पंत जी के प्रति)

कण-कण तृण-तृण में
चिर निवसित
हे! रजत किरन के अनुयायी
सुकुमार प्रकृति के उद्घोषक
जीवंत तुम्हारी कविताई
फूलों के मिस शत वार नमन
स्वीकारो संसृति के सावन
हे चिर अव्यय!
हे चिर नूतन!!

बौछारें धारें जब आतीं
लगता है तुम नभ से उतरे
चाँदनी नहीं है पत्तों पर
चहुँ ओर तुम्हीं तो हो बिखरे
तारापथ के अनुगामी का
कर रही धरा है मूक नमन
हे चिर अव्यय!
हे चिर नूतन!!

सुकुमार वदन' सुकुमार नयन
कौसानी की सुकुमार धूप
पूरा युग जिसमें संदर्शित
ऐसे कवि के तुम मूर्तरूप
हैं व्योम पवन अब खड़े लिए
कर में अभिनंदन पत्र नमन
हे चिर अव्यय!
हे चिर नूतन!!

24 मई 2005 

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