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अनुभूति में महेश केसरी की रचनाएँ

छंदमुक्त में-   
अधेड़ होती प्रेमिका के संशय
पिता का दुःख
पिता के हाथ की रेखाएँ
पिता पुराने दरख़्त की तरह होते हैं    
पीठ पर बेटियाँ 
सम्बंध

 

 

पिता पुराने दरख़्त की तरह होते हैं 

आज आँगन से काट दिया गया
एक पुराना दरख़्त
मेरे बहुत मना करने के बाद भी
लगा जैसे भीड़ में छूट गया हो मुझसे 
मेरे पिता का हाथ
आज, बहुत समय के बाद,
पिता याद आए
वही पिता जिन्होंने उठा रखा था
पूरे घर को अपने कंधों पर
उस दरख़्त की तरह

पिता बरसात में उस छत की तरह थे
जो, पूरे परिवार को भीगने से बचाते 
जाड़े में पिता कंबल की तरह हो जाते
पिता  ओढ़ लेते थे
सबके दु:खों को  

कभी पिता को अपने लिए
कुछ खरीदते हुए नहीं देखा  

वो सबकी जरूरतों को समझते थे.
लेकिन, उनकी अपनी कोई व्यक्तिगत जरूरतें
नहीं थीं
दरख़्त की भी
कोई व्यक्तिगत जरूरत नहीं होती

कटा हुआ पेड़ भी आज सालों बाद
पिता की याद दिला रहा था
बहुत सालों पहले पिता ने
एक छोटा-सा पौधा लगाया था
घर के आँगन में 

पिता उसमें खाद डालते 
और पानी भी रोज ध्यान से याद करके
पिता बताते पेड़ का होना बहुत जरूरी है
आदमी के जीवण में
पिता बताते ये हमें फल, फूल, और 
साफ हवा भी देतें हैं 
कि पेंड़ ने ही थामा हुआ है
पृथ्वी के ओर - छोर को
कि तुम अपने खराब से खराब 
वक्त में भी पेड़ मत काटना 
कि जिस दिन हम काटेंगे पेड़
तो हम भी कट  जाएँगें अपनी जड़ों से

फिर, अगले दिन सोकर उठा
तो मेरा बेटा एक पौधा लगा रहा था 
उसी पुराने दरख़्त के पास  
वो डाल रहा था पौधे में खाद और पानी
लगा जैसे, पिता लौट आए 
और वो दरख़्त भी 

१ जूलाई २०२५

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