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अनुभूति में महेश केसरी की रचनाएँ

छंदमुक्त में-   
अधेड़ होती प्रेमिका के संशय
पिता का दुःख
पिता के हाथ की रेखाएँ
पिता पुराने दरख़्त की तरह होते हैं    
पीठ पर बेटियाँ 
सम्बंध

 

पिता का दु:ख

पिता ने अपने बेटों को पढ़ाया-लिखाया 
उन्हें इस काबिल बनाया कि
वो दुनियाँ के एक सभ्य
इंसान बन पाए

धीरे - धीरे बच्चे बडे़ हो गये
पहली से लेकर दसवीं तक के दस साल 
फुर्र से उड़ गये
ये वो समय था, जब पिता अपने बच्चों की हर
जरुरतों को पूरा करते रहे
बच्चे भी बडे़ होनहार निकले
दोनों इंजीनियर बन गए

पिता अपनी खुशी रोक नहीं पा रहे थे
उन्हें लगा वो दुनिया के सबसे
खुशनसीब इंसान हैं
उन्होंने पा ली हों जैसे स्वर्ग
की सारी खुशियाँ
कि उनसे ज्यादा संपन्न व्यक्ति  अब कोई
इस दुनिया में नहीं है

बेटे अब विदेश चले गए 
वहीं जाकर धीरे- धीरे सेटल हो गये
शुरू- शुरू में बच्चे पर्व- त्योहारों में 
घर आते तो पिता खुश हो जाते
उन्हें लगता
कि जैसे फिर से आबाद हो गया हो घर
कुछ दिनों बाद बच्चे चले जाते
फिर पिता मायूस हो जाते

धीरे-धीरे बच्चों ने पर्व- त्योहारों में भी
घर आना बंद कर दिया
अब उनके पास वक्त नहीं था
पिता के लिए 
वो धीरे - धीरे घर को भी भूलते जा रहे थे

पिता जब भी फोन करते
बच्चे अपनी व्यस्तता गिनवाते
समय के अभाव होने की बातें - दोहराते
किसी ऐसे समय ही पिता ने अपने जीवित
होने के बावजूद करवा लिया था
अपना श्राद्ध 

अखबार में
ये घटना बड़ी प्रमुखता से छपी थी
कि एक व्यक्ति ने जीते-जी करवा लिया है
अपना श्राद्ध.. 
सोचो क्या बीती होगी उनको अपने जीते-जी
करवाते हुए अपना श्राद्ध 

१ जूलाई २०२५

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