अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथ
दोहे पुराने अंकसंकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में मोहन कुमार डहेरिया की कविताएँ

कविताओं में-
एक अनाम रंग के लिए
कोई नहीं जानता
घेरा
फिर किसी को याद करते हुए
मेरे अंदर कुछ है
रात
वापसी

 

रात

गुजरी है अभी-अभी जो रात
शामिल नहीं उसमें मैं

कैसे कहूँ इस रात को रात
न तो शब्दों ने किया चन्द्रमा का राजतिलक
न सुनाई दी स्मृतियों की चमकीली फुसफुसाहट
रात ही थी या पहाड़ी अत्यन्त दुरूह
कि देखते ही होशो-हवास खो बैठे चेतना के घोड़े

अब उमठ रहा अन्दर-ही-अन्दर
मलता बार-बार हाथ
एक थे राहुल सांकृत्यायन
घण्टों का था जिनके पास हिसाब
खर्राटों से सनी पर यह रात
कि होती गहरी वितृष्णा

ऐसी तो नहीं होती थीं मेरी रातें
कि गायब हो जाएँ किसी आदिवासी गाँव से स्याह अँधेरे में
जवान लड़कियों के झुण्ड-के-झुण्ड
और चड़चड़ाएँ न मेरे स्वप्नों के सूखे पत्ते
खुलती थी पँखड़ी-दर-पँखड़ी
असंख्य रंगों, संकेतों और ध्वनियों से भरी
जीवन की इस कर्कशता में भी बोझिल हो जातीं लेटते ही
जिनकी पलकें
कदाचित् न करें विश्वास
नींद में भी उठ कर चढ़ जाता था छत पर
निहारता पूरी सृष्टि
देख आता रात-बिरात, जैसे किसान
ठीक-ठीक तो खड़ी है ईख की फसल
हो सकता है किसी को लगे
मामूली-सी बात में उत्पन्न कर रहा हूँ पेचीदगी
रात ही थी गुजर गयी तो गुजर गयी
चींटी काटने जितना होगा उसका दुख
एकदम सही हैं वे
चींटियों की ही भाषा में कर रहा हूँ बातें
समझ सकती जिसे सिर्फ पृथ्वी

अब जबकि उदय हो रहा है सूर्य
निकल पड़े परिंदे अपने-अपने काम-धंधों पर
मैं निठल्ला-सा बैठा
क्या करूँ इस रात का
वेताल-सी लदी है जो पीठ पर।
 

24 नवंबर 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter