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अनुभूति में नीहारिका झा पाण्डेय की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
एक निवाला
कुछ गढ़ा करो
ज्वलंत विषय
मैं मनुष्य हूँ
शहर

`

एक निवाला

तुम तो रोज खाते होगे
कई निवाले,
मैं तो कई सदियों से हूँ भूखा,
अभागा, लाचार, लतियाया हुआ।
रोज गुजरता हूँ तुम्हाूरी देहरी से
आस लिए कि कभी तो पड़ेगी तुम्हाररी भी नजर,
इसी उम्मी द से हर रोज आता हूँ,
फिर भी पहचान क्याी बताऊँ अपनी,
कभी विदर्भ तो कभी कालाहांडी से छपता हूँ,
गुमनामी की चीत्कार लिए,
जो नहीं गूँजती इस हो-हंगामे में।
ना नाम माँगता हूँ,
ना ही कोई मुआवजा,
उन अनगिनत निवालों का हिसाब भी नहीं,
विनती है ! केवल इतनी,
मौत का एक निवाला चैन से लेने दो।

४ जुलाई २०११

 

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