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अनुभूति में शंभु चौधरी की
रचनाएँ -

छंद मुक्त में-
निःशब्द हो जलता रहा
मानव अधिकार
मैं भी स्वतंत्र हो पाता
श्रद्धांजलि

हम और वे

 

मानव अधिकार

जेल में बंद एक अपराधी ने,
आयोग से गुहार लगाई।

हजूर!
मैं अपराधी नहीं हूँ,
कत्ल के आरोप जो लगे हैं
अदालत में न कोई गवाह, न उनके कोई सबूत मिले हैं,
और जो कत्ल हुए हैं
उनके गुनहगार सत्ता के मुलाज़िम हैं।
मैंने तो बस पेट के लिए
उनका काम ही किया है,

हजूर!
ये लोग रोज़ मुझे मारते-पीटते
और मुझ पे ज़ुल्म ढाते हैं,
तड़पा-तड़पा के पानी पिलाते
व दो दिन में एक बार ही खिलाते हैं
कड़कती सर्दी में रात को कंबल छीन कर ले जाते हैं,
दवा के नाम पे ज़हर देने की बात दोहराते हैं।

हजूर!
ऐसा लगता है, आकाओं के डर से
मुझे डराते और धमकाते हैं,
भेद ना खुल जाए, इसलिए
बार-बार आकर मुझे समझाते हैं
मुझे डर है कि ये लोग मुझ से भी बड़े अपराधी हैं
जो कानून की शरण में
सारे गैर-कानूनी हथकंडे अपनाते हैं।

हजूर!
मैं न सिर्फ़ निर्दोष,
गरीब और बाल-बच्चेदार भी हूँ,
घर में मेरी पत्नी और बीमार माँ परेशान है,
मेरे सिवा उनको देखने वाला न कोई दूसरा इंसान है,
बच्चे सब छोटे-छोटे, करता मैं फरियाद हूँ।

हजूर!
ये लोग जान से मारने का सारा इंतज़ाम कर चुके हैं,
अदालत से कहीं ज़्यादा इनका ख़ौफ़
करता मुझे हैरान है,
कल तक मैं सोचा करता था,
शहर का सबसे बड़ा अपराधी मैं ही हूँ,
इनकी दुनिया देख तो लगता है
मैं तो कुछ भी नहीं हूँ।

हजूर!
मैं मानव हूँ, मुझे भी जीने का अधिकार है,
आप ही मेरे कृष्ण भगवान हैं,
इस काल कोठरी में दिखती
एक मात्र आशा की किरण,
जो आपके गलियारे से आती दिखाई देती है।
इसलिए है मानवाधिकार!

हजूर!
आपके शरण में मैं खड़ा हूँ!
आपके शरण में मैं खड़ा हूँ!

१७ नवंबर २००८

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