अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में शंभु चौधरी की
रचनाएँ -

छंद मुक्त में-
निःशब्द हो जलता रहा
मानव अधिकार
मैं भी स्वतंत्र हो पाता
श्रद्धांजलि

हम और वे

 

श्रद्धांजलि

नमन तुम्हें, नमन तुम्हें, नमन तुम्हें,
वतन की राह पे खड़े तुम वीर हो,
वतन पे जो मिटे वो तन,
नमन तुम्हें, नमन तुम्हें,
नमन तुम्हें, नमन तुम्हें,
ये शहीदों की चिता नहीं,
भारत नूर है,
चरणों पे चढ़ते 'हिन्द'! तिरंगे फूल हैं।
मिटे जो मन, मिटे जो धन,
मिटे जो तन वतन की राह पे खड़े तुम वीर हो,
वतन पे जो मिटे वो तन,
नमन तुम्हें नमन तुम्हें! नमन तुम्हें! नमन तुम्हें!

१७ नवंबर २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter