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उड़ान
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मेरा परिचय
शब्द
सोनचिरैया
 

  उड़ान

जब भी मैं आसमान की ओर देखता हूँ
चिड़ियों की उड़ान उदास कर देती है
अपने कन्धों पर महसूस करता हूँ
झड़ गए पंखों के निशान
गहरे घाव की तरह
दर्द उभरता है और निगल जाता है मुझे
नहीं, अब उड़ नहीं सकता मैं
आसमान से धरती को नहीं देख सकता
एक साथ, एक नजर में
गोते नहीं लगा सकता
सितारों के नीचे, जमीन के ऊपर
खुद को समेटकर
चिड़ियों के पीछे नहीं भाग सकता
उनके घोंसलों तक
उनके बच्चों को माँ की तरह
स्पर्श नहीं कर सकता
मुझे याद है धरती पर बिखरे
सुख-सौन्दर्य के लालच में
मैंने ही अपने पंख कतर डाले
बाँध लिया अपने आप को
मुरझा जाने वाले फूलों की पंखडियों से
समय के साथ ख़त्म हो जाने वाली
खुशबू की बेड़ियों से
मेरे मन में धरती पर उगने की
ऐसी आकांक्षा जगी
की मैं रोक नहीं सका अपने आप को
उगा तो पर अब उड़ान कहाँ
पेड़ हो गया जबसे
सोचता हूँ उड़ान से लौटकर
चिड़ियों का झुण्ड
मेरी हजार बाँहों पर
बैठा करे आपस में बतियाते हुए
मेरी पत्तियों की आड़ में घोंसले बनाए
सो जाए रोज सुबह होने तक
ताकि मैं भी थोड़ी देर के लिए ही सही
पेड़ से चिड़िया में बदल सकूँ

२६ अप्रैल २०१०

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