अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में उदय खनाल 'उमेश'
की रचनाएँ —

गीतों में
जीवन उपवन में
मैं प्रतिबिम्ब उसी का रे

छंदमुक्त में-
विडम्बना

सितारों से
 

 

मैं प्रतिबिम्ब उसी का रे

मेरे प्राणों के स्पन्दन वह ही मंजुल छवि बाले!
उलझ उलझ हैं प्राण लुप्त बालों में जिसके घुँघराले!

पलपल उससे दूर नहीं अब स्वस्थ बना रह पाता है,
उसका चिंतन और मनन ही मन–मतंग को भाता है।
प्राणों के भी प्राणों में वो बैठ गयी है ऐसे रे,
बैठ गये हो अविचल–हिमगिरि धरा–अंक में जैसे रे।

अब से पहले जो सपना थी अब अपना बन आयी है,
कब की बिखरी आशाओं को वो समेटकर लायी है।
अब यदि वो छोड़ेगी मुझको प्राण नहीं रह पायेगा,
रह जाये कुछ धोखे से तो मुर्दा ही रह जायगा।

वो मेरा शोणित–संचालन नयन–युगल की आभा भी,
कर की शक्ति सतत विजयी वो, अन्त–तत्व की प्रतिभा भी।
वह मेरी बुद्धि की जननी, वह ही मन की स्थिरता है,
रग–रग में उसकी ही धुन है जीवनकी सुर–सरिता है।

मेरा जीवन उसके कर में मेहंदी बनकर पैठ गया,
वह मेहंदी उन्हीं हाथों में अब चितरेखा बन बैठ गया।
सच मानो यह ख्याल नहीं है स्वर्ण–कथा सच्चाई की,
मेरा सब कुछ उसमें, मैं तो ढाँचा भर परछाई की।
अमृत–बिम्ब बनी वह मेरा, मैं प्रतिबिम्ब उसीका रे,
यदि वो है हिमगिरि की सलिला, मैं फिर उसकी धारा रे।।

दिसंबर २००२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter