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सन्नाटों के पहरेदार
स्मृतिदंश

 

 

सन्नाटों के पहरेदार

भीतर छिपे सन्नाटे
कब तक रहते खामोश,
उम्रें तमाम होती रहीं
चुप्पी टूटी आया होश!
जुबां पाई खामोशियों ने
सावन की बूँदें बरसीं
सीपी में छिपी स्वाति–बूंद
अमूल्य मोती बन निकली।
पहरे हटे अँधियारे के
ज्योति किरण चमकी
तेज इतना कि रोशनी से
सरोबार हो गई ज़िन्दगी।
दरिया की मदमस्ती
उमड़ी है लाँघ दरो–दीवार
न रूकेगा वेग यह
स्तब्ध हैं सन्नाटों के पहरेदार!!

१६ मार्च २००४

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