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अनुभूति में विोद दवे की रचनाएँ--

छंदमुक्त में-
टेसू
नदी का मर जाना
माँ ने कहा था
मेरा गाँव

 

नदी का मर जाना

नदी के कगार पर
कई सभ्यताओं ने आँखें खोलीं
कल कल के इस नाद में
कई संस्कृतियों ने लोरी महसूस की
न जाने कितने नाजुक पाँवों की पायलिया
इस पानी में छम छम करती
प्रेम कहानियाँ लिख गई
इसके किनारे कई बेटों ने चलना सीखा
कई बाप अंतिम बार
बेटों के कंधों आरूढ़ हो अंतिम यात्रा हेतु आए
नदी ने श्याम को
गोपियों के वस्त्रों को छिपाते देखा है
नदी ने देखा है काल का हर वो वार
जो लील गया कई सभ्यताओं को
नदी ने देखा है बादलों के माध्यम से
स्वयं का स्वयं में मिल जाना
बचपन में सोचता जहाँ गाँव होते हैं
वहाँ नदी और तालाब क्यों होते हैं
अब कहता फिरता हूँ
ये गाँव और नगर हैं
जब तक नदी और तालाब हैं।
इन्हें सँभालना होगा क्योंकि
एक नदी की मौत में
सैकड़ों सभ्यताएँ सती हो जाती हैं।

१ फरवरी २०१७

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