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सात क्षणिकाएँ

 

सात क्षणिकाएँ                         
 

तेरी आवाज़ की
एक खुश्बू
दिल के दरवाजे को धकेल
मेरी रूह को
सराबोर कर गयी
और मैं
सोचती ही रह गयी,
कि,
मैं तेरी कौन लगती हूँ



मैं, तू
ख़ामोशी
सूखे पत्ते
फिर एक
इतिहास..


अक्षरों के हुस्न
कागजों की अमानत
आँख की मोमबती
रात भर जलती
बनती कविता


वही मोड़
फिर वही आवाज
ठहरी रात
सुबह का सूरज
रौशनी
फिर सब ख़तम


आज समुन्दर को,
जाने
क्या ख़याल आया
चाँद से छुप कर
चाँदनी में नहा आया


यादों की चारपाई
उम्र का बिछौना
नज्मों को ओढ़
पकड़े ही रह गयी
उस रात का कोना


तेरी गलियों की
हवा की एक महक
अहसासों के
बंद किवाड़ धकेल
मेरी रूह के कानों में
पायल बजा गई

५ दिसंबर २०११

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