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संगति
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लक्ष्मी

 

संदूक

मैंने फिर आज
पुरानी यादों का
संदूक खोला
गुज़रे लम्हों को तोला

कुछ ढलके आँसू
जो अब भी नर्म थे
भूले बिसरे अफसाने
अब तक गर्म थे

कुछ पत्थर कुछ मोती
जो मैने बटोरे थे
बचपन की यादों के
रेशमी डोेरे थे

कागज के टुकड़े थे
अनलिखी कहानी थी
हो गई फिर ताजी
पीर जो पुरानी थी

बंद संदूक में
ख्वाहिश की कतरन थीं
तबले की थापें थीं
टुकड़े थे, परन थीं

देखा सराहा
कुछ आँसू बहाए
बंद संदूक में
फिर सब छिपाए

१ मई २००६

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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