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अनुभूति में सरोज भटनागर की रचनाएँ-

छंदमुक्त में —
अभ्युदय
अस्तित्व
आँखें
बद्री विशाल
मैं भारतीय हूँ
चट्टान का फूल

संकलन में-
ज्योति पर्व– मन करता है

 

चट्टान का फूल

चट्टान के बीच में
खिला हुआ चमकीला फूल
सिर उठाए घमंड से
चट्टान है तो क्या हुआ
तुम दूर से मुझे देख सकते हो
मेरे रंग और खुशबू को
महसूस कर सकते हो
तपेगा सूर्य तो क्या हुआ
मै हवा की थोड़ी सी नमी पा
अपने को सम्भाल लूँगा
फिर चली आएगी शाम
निकट अँधेरे के
फिर चिड़िया लौटेगी
यहाँ पास के किसी खोह में।
मुझे अपना गीत सुना
सुलाएगी मेरी पत्तियों को हिला
मैं अपना जीवन इसी तरह जी लूँगा
चट्टान के बीच खिला तो क्या हुआ
उचक–उचक कर सबको देखा है
और सबने मुझे–
क्योंकि मैं अकेला था– इसीलिए
सबकी नज़र मुझ पर पड़ी
बहुत फूलों के झुरमुट में
शायद मेरा सौन्दर्य और
चटकीला रंग इतना आकर्षित न करता
मुझे सन्तोष है
मैंने अपना जीवन एकाकी जिया
और खुशी खुशी
सुख जो मिला
उसने अकेले का एहसास ही
न होने दिया।

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