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अनुभूति में डॉ. सुधा ओम ढींगरा की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
चाँदनी से नहाने लगी
प्रकृति से सीख
पूर्णता
बेबसी
मोम की गुड़िया

छंदमुक्त में-
कभी कभी
तुम्हें क्या याद आया
तेरा मेरा साथ
बदलाव
भ्रम
यह वादा करो

 

  भ्रम

शंकर को ढूँढ़ने चले
हनुमान मिल गए,
क्या-क्या बदल के रूप-
अनजान मिल गए।

एक दूसरे से पहले
दर्शन की होड़ में;
अनगिनत लोग रौंदते-
इनसान मिल गए।

माथे लगा के टीका
भक्तों की भीड़ में;
भक्ति की शिक्षा देते-
शैतान मिल गए।

अपने ही अंतर्मन तक
जिसने कभी भी देखा,
दूर दिल में हँसते हुए-
नादान मिल गए।

तोड़ा था पुजारी ने
मन्दिर के भरम को,
जब सिक्के लिए हाथ में-
बेईमान मिल गए।

कुछ रिसते झोपड़ों में
जब झाँक कर देखा,
मानुषी भेस में स्वयं-
भगवान मिल गए।

अपने को समझते हैं
जो ईश्वर से बढ़कर,
संसार को भी कैसे-कैसे-
विद्वान मिल गए।

किस पर करे विश्वास
आशंकित-सी सुधा,
देवता के रूप में जब-
हैवान मिल गए।

२२ दिसंबर २००८

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