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पड़ रहा है दीप मद्धिम

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क्षितिज - तीन कविताएँ

 

पड़ रहा है दीप मद्धिम

पड़ रहा है दीप मद्धिम,  कोई नूतन लौ लगा लो।
भागते सुख-दुःख पलों से,  एक अपना पल चुरा लो।

शाम के पनघट खड़ा है,  दिवस-श्रम से थकित सूरज
मन की सारी वासनाएँ,  इस घड़ी इस घट डुबा लो।

गर ठहर जाते पल एक दो, ज़िंदगी बेसुर न बनती
रूह से फिर रूबरू हो,  आँख में सपने सजा लो।

कह रहा वाइज़ सभी को,  आग की बातें कभी से
वन-अनल की दाह रोके,  तुम कोई दाहक जला लो।

मोड़ से भागी हुई,  दिग्भ्रम पड़ी नटखट सड़क को
ठौर-ओ'-ठिकाने के लिए, घर तलक अपने बुला लो।

इस शहर में बोल धीमें,  पड़ रहे हैं पक्षियों के
प्रगति के हाथों बिखरती, घर की कुछ मिट्टी बचा लो।

1 जुलाई 2007

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