अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में सरदार कल्याण सिंह
के दोहे -

नए दोहे—
नीति के दोहे

दोहों में--
ग्रीष्म पचीसी
चुनावी चालीसा
दोहे हैं कल्याण के
मज़दूर
मूर्ख दिवस

संकलन में—
ममतामयी—माँ के नाम

 

मज़दूर

मई दिवस को भूल कर हुए नशे में चूर।
आदत से मजबूर थे मेहनत कश मजदूर।।1।।

पी शराब मज़दूर ने बेच रही सरकार।
करना भला ग़रीब का किसको है दरकार।।2।।

बच्चे मज़दूरी करें घटे देश की शान।
न करें तो कैसे चले उनका घर कल्यान।।3।।

करे सुबह से शाम तक काम विवश मजदूर।
घर-घर बर्तन माँजती उसके दिल की हूर।।4।।

बीवी हो मज़दूर की वह भी पाए मान।
वर्ना कहना ढोंग है भारत देश महान।।5।।

बन बंधुआ मज़दूर न कहता है कानून।
रोटी देता है नहीं कैसे घटे जुनून।।6।।

हमदर्दी सरकार की बदले सिर्फ़ विधान।
शिक्षा दो मज़दूर को हो उसका कल्यान।।7।।

शिक्षा दो मज़दूर को करता ज़्यादा काम।
मालिक को आराम हो उसको भी आराम।।8।।

आँखें उनकी देख कर जाना समझ जुबान।
बच्चे हैं मजदूर के लेकिन हैं इंसान।।9।।

हम हैं खाना खा चुके चार बार सरकार।
होते यदि मजबूर तो खाते कितनी बार।।10।।

देखें केवल आज को भारत के मज़दूर।
पैसा हो यदि गाँठ में नहीं काम मंजूर।।11।।

मालिक जल कर दूध से सोचे हो मजबूर।
मिलते उनको क्यों नहीं दूध धुले मज़दूर।।12।।

कह दो तू मज़दूर को होता बेआराम।
मिस्त्री जी उसको कहो करता दूना काम।।13।।

किस्मत को सब कोसते दुनिया का दस्तूर।
भाग्य बनाते आप खुद मेहनत कश मज़दूर।।14।।

कुछ हों रानी चींटियाँ कुछ होती हैं दास।
सभी बराबर होय तो होता नहीं विकास।।15।।

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।