अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में मदन वात्स्यायन की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
ऋतु संहार
दो बिहाग
नख-शिख
शुक्रतारा

 

नख-शिख

आकाशगंगा में न बहते द्वीप होत हैं,
न उषा से पहली किरण में कोई रंग
प्रिये दोनो ओर तेरे काले बालों के
बीच में तेरी माँग है।

रूप सागर के तीर पर मेरी कल्पना ने सुना प्रकृतिश्री
कह रही थी---
रूपवानों मैं नारी हूँ
नारी के अंगों में नाक
नाकों में सुश्री प्र की नासिका

चाँद में है
ठंडी रौशनी
पुतलियों में तेरी
अंधकार चमाचम
उसके पत्ते सारे जिंदगी लाल किसलय रहते हैं
जिनकी कोरों में खिलती हैं बारहों मास बेलियाँ---
प्याली अलका के नाजुक वसंत के
या तेरी हँसी के।

बेली की कौड़ियों जैसे तेरे नन्हें नन्हें हाथ
जो मेरी अंजलि में बसते थे
माँ के डैनों तले
चूजों जैसे।

बेगहनों के तेरे गोरे अंग है और
बेबेलबूटों की तेरी श्वेत साड़ी
चारों ओर उजले बादल हैं
और ग्लावा चमक रही है

२९ अगस्त २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter