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अनुभूति में देवेंद्र आर्य की रचनाएँ-

नए गीत-
ज़िंदगी की गंध
रहूँगा भोर तक
बहुत अँधेरा है
शब्द की तलवार
 

गीतों में-
आशय बदल गया
इतना ज्ञान नहीं
किससे बात करें
तुम्हारे बिन
बात अब तो खत्म करिए
मन सूखे पौधे लगते हैं

अंजुमन में-
जीवन क्या है
 

  बहुत अंधेरा है

खुले हुए वातायन मन के
सब जग मेरा है
सूरज से कहना
आ जाए
बहुत अंधेरा है!

मैंने
खुशियों की सरहद पर
बोए चंदन हैं
नागफनी पर
विषधर पर
बाँधे सौ बंधन हैं

खुशबू को घर-घर रख दूँ
मन कान्ह बसेरा है!

रिश्तों की रूठी ठिठुरन
अब कुछ तो पिछली है
संबंधों के गहरे जल में
सिहरन निकली है

नदिया में सागर बजता
सरगम का घेरा है!

संदर्भों से जुड़ना
जुड़कर
कुछ सार्थक करना
बहुत बड़ा परिवेश
बनाकर हँसना
खुश रहना

दो पल का जीवन
जीवन हो
जग चकफेरा है!

२६ अक्तूबर २००९

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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