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अनुभूति में डॉ. कैलाश निगम की
रचनाएँ-

गीतों में-
आओ प्यार करें
इस कोने से उस कोने तक
कब तक और सहे
मीठे ज्वालामुखी
मेरे देश अब तो जाग
समय सत्ता

 

इस कोने से उस कोने तक

इस कोने से उस कोने तक ऐसे दाग लगे
जितनी धोई उतनी मैली
चादर और हुई

चाहा विश्वासों के पौधे फूलें और फलें,
प्रज्ञा हो पूजित दीपों के वन्दरवार जलें
किन्तु न जाने कैसी उल्टी हवा लगी बहने ?
राजहंस भी बगुलों जैसे रंग-ढँग बदलें
सच-औ-झूठ मिले ऐसे, ज्यों दूध और पानी
अब तो सही न्याय की आशा
दुष्कर और हुई

काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह का ही क्रम है जारी
दानी अब याचक है, साधू भ्रम के व्यापारी
ममता, आदर, दया, क्षमा की बातें व्यर्थ लगें
टूटी रही है तन से मन की हर साझेदारी
नवयुग को पालती-पोसती नई संहिता सी
कपट अर्थ वाली वह आखर-
आखर और हुई

घर, बस्ती से देश तलक जो चादर फैली है
जिनको धोना था, उनके कर्मो से मैली है
धुला न कोई दाग नये लगते ही चले गये
प्रजातंत्र-पद्धति की मिसरी हुई कसैली है
जिनके हाथों युवा शक्ति निशिवासर छली गई
उन्ही वंचकों पर नव पीढ़ी
निर्भर और हुई

७ जनवरी २०१३

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