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रचनाएँ-

नए गीतों में-
मौन को उत्सव बनाओ
यादों की खुशबू
यादों की निशिगंधा
ये सफेदपोश बादल
रिश्तों का अहसास

गीतों में-
क्यों नदियाँ चुप हैं
कजरारे बादल
जेठ की तपती दोपहरी में
धान रोपते हाथ
धैर्य का कपोत
निष्ठुर बादल
प्यासी नदी
बहुत घुटन है
भारत क्यों प्यासा
शब्दों के पंख

संकलन में-
रूप बादल हुआ

 

कजरारे बादल

फिर-फिर मेघ
मुखर घिर आते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती,
द्वार-मुडेरी
झड़ी लगाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

कभी धवल कजरारे बादल,
मदिरा से मतवाले बादल,
'जीन्स' पहन रूमाल हिलाते
ये मनचले रंगीले बादल।
घर-घर मेघदूत
बन गाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

जब मिलने को पुरवा चलती
गदराई बालियाँ मचलतीं,
ढीठ छोकरी-सी इठलाकर
खिड़की पर बिजली क्या कहती?
फिर-फिर मेघमल्हार
सुनाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

जब-जब रिमझिम बरसे पानी,
बढ़ जाती है प्यास पुरानी,
किसको सपने दर्द सुनाएँ
हर आँसू की यही कहानी?
बदरा सारी रात
जगाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती,
द्वार-मुडेरी झड़ी
लगाते, फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।

१६ अप्रैल २००६

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