अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में राहुल शिवाय की रचनाएँ— 

गीतों में-
आग शहर में फैल रही है
झूल जाओ प्राण तज दो
तेरे आने से
दीवारों में बँटा हुआ अब
पतझड़ बीत गया है
बाबू जी का खत आया है
सिर्फ बाँचने लगे समस्या
हम अपनों के मारे
 

 

आग शहर में फैल रही है

आग शहर में फैल रही है
मगर सुरक्षित चूहे बिल में

भेद-भाव का यह दावानल
हरी घास भी लगा जलाने
भाषण में भी तेवर जागे
चली आग फिर आग बुझाने
शोर उठा है जग का मालिक
इस जग में है अब मुश्किल में

जिस हमीद के साथ राम की
होती थी कल ईद-दिवाली
आज एक-दूजे को घायल
कर वो बजा रहें हैं ताली
ढूँढ रहा है शहर मसीहा
बेदिल रहबर में, कातिल में

बचे हुए, अधजले शहर में
है विलाप, है शोर-शराबा
इधर आँच पर हाथ सेंकने
आया है फिर से इक दाबा
सदमा खा, सदमा देने की
उधर पल रही ख्वाहिश दिल में

१ फरवरी २०१८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter