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नये गीतों में-
एक नदी
गीत जल संवेदना के
पाँखुरी नोची गई
मत उदास हो
मैं अकेला ही चला हूँ
शुभ महूरत

गीतों में-
मान जा मन
जादू टोने

शब्द जो हमने बुने

 

गीत जल संवेदना के

अब नहीं
शृंगार प्रणय-याचना के
मैं लिखूँगा गीत जल-संवेदना के

पूछते हैं रेत के टीले हवासे
खोखला संकल्प क्यों जल-संचयन का
गोद में तटबन्ध के लगता भला है
हो नदी का नीर या पानी नयन का

अब नहीं
मनुहार मधुवन यौवना के
मैं लिखूँगा गीत जल-अभिव्यंजना के

ताल के अस्तित्व पर हँसती हुईं जब
तैरती हैं सुनहरी अट्टालिकाएँ
बादलों से प्रश्न करतीं मछलियाँ तब
किस जगह अपना घरौंदा हम बनाएँ

अब नहीं
व्यापार कंचन-कामना के
मैं लिखूँगा गीत जल-आराधना के

एक दिन हो जाएगा बंजर धरातल
बीज बारिश के यहाँ बोने पड़ेंगे
तप्त अधरों पर कई सूरज लिये हम
मरुथलों में युद्ध पानी के लड़ेंगे

अब नहीं
दरबार में नत प्रार्थना के
मैं लिखूँगा गीत जल-शुभकामना के

६ अप्रैल २०१५

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