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बापू की आत्मा

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सरकारी बाबू

दोहों में-
पवन चंदन के दोहे

 

बापू की आत्मा

जो गणतंत्र मैंने तुम्हे दिया
उसका तुमने क्या किया
सुना है
बंदरबाँट चलती है
मुझे यह बात खलती है

हे संपूर्ण देश के
सरकारी बापू
बंदर-बाँट का
तुम्हें क्या गिला है
कुछ हिस्सा तो
तुम्हें भी मिला है
ये सच है कि तुमने हमें
राजपाट दिया है
मगर मत भूलो
हमने भी
तुम्हें राजघाट दिया है
सैंकड़ों एकड़
कुछ कम नहीं होती
और
राजधानी में
ज़मीन की कीमत
कभी कम नहीं होती
फिर भी ज़रूरत
तो पैसे बना
तेरी ही चीज़ है
जब देश बिक सकता है
तो समाधि क्या चीज़ है

अब तू
खुश हो या खफ़ा हो
जो मिलना था
मिल गया
चल दफा हो

मैंने अंग्रेज़ों के
जुल्म सहे हैं
और जो शब्द तुमने

कहे है
उनको भी सहूँगा
पर एक बात कहूँगा
मैंने अपना संपूर्ण जीवन
निस्वार्थ लगाया है
तब कहीं
ये गणतंत्र पाया है

आप
एक जीवन खर्च कर
एहसान जता रहे हैं
अरे...
हम आपको बता रहे हैं
कि अगर
ऊपर वाले बाबू
हमारी जान पहचान के होंगे
तो हमारे सातों जन्म
हिंदुस्तान में होंगे
रिश्वत भी देनी पड़ेगी
तो देंगे
पर पैदा
हिंदुस्तान में ही होंगे

आत्मा बोली
ऐसा किसलिए

विदेशी सौदों के लिए
कहीं तोपों का
कहीं सीमेंट का
कहीं युरिए का
कहीं चीनी का
और जानवरों के चारे का
या घोटालों का

कहीं धर्म का ईमान का
कहीं बोलते इंसान का
हो सका तो देख लेंगे
देश हिंदुस्तान का

सौदों की सुनकर
परेशान होने लगी
बाहू की आत्मा रोने लगी

सौदों की सुन कर
क्यों रोता है
हर सौदा तेरे सामने होता है

हमारे हर सौदे का
तू चश्मदीद गवाह है
इसीलिए तेरा फोटो नोटों पर छपा है

हैरान बापू की आत्मा
अगला प्रश्न कर रही है
मेरे देश की निरिह जनता
अब क्या कर रही है

आप ही का अनुसरण कर रही है
आपने गोली खाई थी
वो भी खा रही है
आपका लहू बहा
वो भी बहा रही है
फिर भी भली-चंगी है
आप अधनंगे थे
वो नंगी है

कुछ तेरे पैगाम पर
कुछ फैशन के नाम पर
बाकी जो गरीबी के नीचे हैं
उनके कपड़े महँगाई ने खींचे हैं
आपने नमक कानून तोड़ा था
दांडी यात्रा का
सिलसिला जोड़ा था

कानून भी टूट रहे हैं
सिलसिला भी जु़ड़ा है
हर नेता, अभिनेता
यात्राओं पर अड़ा है
तूने यात्राओं की होड़ लगवा दी
हमने तो कई बार
दौ़ड़ लगवा दी

आपने झंडे फहराए
हम भी फहराते हैं
कभी अयोध्या
तो कभी कश्मीर जाते हैं
अब भी कोई कसर है
तू जो अजर अमर है

और तो और जब हम
चुनाव जीत कर आते हैं
सबसे पहले
तेरी ही कसम खाते हैं
उसके बाद ही
इस देश का नंबर आता है
इससे ज़्यादा
तू क्या चाहता है...?
इससे ज़्यादा तू क्या चाहता है...?
इतना सुनते ही
बापू की आत्मा
जैसे हवाओं में घुल गई
और हमारी आँख खुल गई

१० अगस्त २००९

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