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अनुभूति में अमित माथुर की
रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
कल्लों में भरते हैं
मुफ्त मिलती हैं
सही समय पर गए

 

 

कल्लों में भरते हैं

दास बाबू की लड़की ने
एक मासूम सा प्रश्न पूछा कल
बोली अंकल अंकल
ये नेता लोग
जो इतना खाता है
इनके गोल गोल बॉडी में
वो कहाँ समाता है?
हमने कहा
बेटा ये पेट भर खाते हैं
वो बोली 'फिर'
फिर गले तक आते हैं
'फिर'
प्रश्न निर्दोष थे
पर हम खामोश थे
ये तो सच है कि
हर नेता भूखा है
पर इस 'फिर' के उत्तर में
समस्त ज्ञान सूखा है
हमने कहा
'तुम ही बता दो टिन्नी'
उसके अधरों पर
मुस्कान खिली नन्हीं
'मालूम है
इतने खाने का ये क्या करते हैं?
जब पेट और गला भर जाता है
तब ये उसे कल्लों में भरते हैं।'

नोटः कल्ले 'गालों' को कहते हैं

१ जुलाई २००१

 

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