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अनुभूति में अमित माथुर की
रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
कल्लों में भरते हैं
मुफ्त मिलती हैं
सही समय पर गए

 

 

मुफ्त मिलती हैं

कल शाम
मेरी अर्धांगिनी
दौड़ी दौड़ी मेरे पास आई
आते ही
नई दुल्हन की तरह लजाई
और मुझे एक
अत्यंत खर्चीली बात सुनाई
'हे प्राणनाथ
सोने का लॉकेट मुफ्त मिल रहा है
सोने की चेन के साथ।'
हम खुल कर तो नहीं
पर मन ही मन मुस्काए थे
हमेशा बेकार चीज के साथ
मुफ्त सामान मिलता है
जैसे तुम्हारे साथ हम
दहेज मुफ्त लाए थे।

१ जुलाई २००१

 

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