अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में दीप्ति शर्मा की रचनाएँ-


छंदमुक्त में-
अनुभव
कीमत
तुम और मैं
पुरानी यादों के स्मृतिपात्र
वो

 

 

 

वो

एकांत में एकदम चुप
कँपते ठंडे पड़े हाथों को
आपस की रगड़ से गरम करती
वो शांत है
ना भूख है
ना प्यास है
बस बैठी है
उड़ते पंछियों को देखती
घास को छूती, तो कभी सहलाती
और कभी उखाड़ती है
जिस पर वह बैठी है
उसी बग़ीचे में
जहाँ के फूलों से प्यार है
पर वो फूल सूख रहे हैं
धीरे धीरे फीके पड़ रहे हैं
उनके साथ बैठकर
जो डर जाता रहा
अकेलेपन का
अब फिर वो हावी हो रहा है
इन फूलों के खतम होने के साथ
ये डर भी बढ़ रहा है
फिर कैसे सँभाल पाएगी
वो इन काँपते हाथों को,
लड़खड़ाते पैरों को
इन ठंडे पड़े हाथों की रगड़ भी
फिर गरमी नहीं दे पाएगी
वो भी मुरझा जायेगी
इन फूलों के साथ।

७ अक्तूबर २०१३

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter