अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में हेम ज्योत्स्ना पाराशर
की रचनाएँ—

उड़ती तितली की तरह
उड़ना हवा में खुल कर 
कविता हूँ मैं
बहुत काम आया हमें
बुढ़ापा
बेड़ियाँ बाकी अभी है
हे जीव जगत के

 

बुढ़ापा

आँगन की तपती दोपहरी में, खाट के जैसे तपता-सा
अपनो के चेहरों में ही, अपनों की राहें तकता-सा।

चेहरे की झुर्री में मुस्कान कहीं गुम हो जाती,
तनहाई में यादों की, बातें पुरानी रटता-सा।

इस गली से उस मोड़ तक नज़रे जा-जा कर आती,
हाथ में लाठी, बैठ बगीचे में, सुख-दुख के पंखे झलता-सा।

अपने ही किस्सों की कहानी बुन-बुन कर, सबको सुनाता,
देख चुका जीवन के सब रंग, बन बैठा अब पतझड़-सा।

चकाचौंध से घर में दिवाली होती है अक्सर अब तो,
बेबसी में बेवजह, बाम पे रखा, 'दीप' कोई है जलता-सा।

३१ मार्च २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics