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अनुभूति में हेम ज्योत्स्ना पाराशर
की रचनाएँ—

उड़ती तितली की तरह
उड़ना हवा में खुल कर 
कविता हूँ मैं
बहुत काम आया हमें
बुढ़ापा
बेड़ियाँ बाकी अभी है
हे जीव जगत के

 

उड़ना हवा में

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मीं से मिला कर रखना।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को ज़िंदा रखना।

वक्त के साथ चलते-चलते, खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना।

तूफ़ानों को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और माँझी का याद पता रखना।

हर कहीं ज़िन्दगी एक-सी ही होती हैं,
अपने ज़ख़्मों को अपनो को बता कर रखना।

मंदिरों में ही मिलते हो भगवान ज़रूरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में ज़िन्दगी का लुत्फ उठाए रखना।

दर्द कभी आख़िरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्कों को बचा कर रखना।

मंज़िल को पाना ज़रूरी भी नहीं,
मंज़िलों से सदा फासला रखना।

सूरज तो रोज़ ही आता है मगर,
अपने दिलों में 'दीप' को जला कर रखना।

१४ अप्रैल २००८

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