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अनुभूति में महिमा बोकारिया की रचनाएँ-

कोई क्या करेगा प्रीत का अंकन
जिस मोड़ से गुज़रो
प्रतीक्षा के पल
बना रहूँ सदा मनमीत
राही, तुम ठहरना बस दो पल

 

बना रहूँ सदा मनमीत

नहीं चाहत आऊँ कभी तुम्हारे ख़्वाबों में
या फिर तेरी मुस्कान से सुरभित बागों में
पर जब तनहाई चुराने लगे तुमसे तुम्हारी प्रीत
साथ देने तुम्हारा, मैं खड़ा सदा मनमीत।।

नहीं हसरत तू मुझे लिखे रोज डायरी में
या झलक मेरी दिखे तेरी किसी चर्चित शायरी में
पर जब कभी तेरे अश्कों से बहने लगे गीत
उसे थामने मैं खड़ा सदा मनमीत।।

नहीं बुलाना भले अपनी कामयाबी के जश्न में
या माँगना दुआओं के लिए फैले दामन में
पर जब कभी राह मे तुम्हें न मिले जीत
हमराह बनने मैं खड़ा सदा मनमीत।।

यही आरजू, तेरे जीवन मे खुशियों का पारावार हो
और तेरे हर गम पर मेरा अधिकार हो
तेरे हर तमस को हर जाऊँ, बन दीप प्रदीप्त
अपना अक्स उकेरे बिना ही बना रहूँ सदा मनमीत।।

मेरी खामोश अनाम चाहत की इतनी-सी हैं रीत
बिन रिश्ते बिन बंधन के बना रहूँ सदा मनमीत।।

24 दिसंबर 2007
 

१३

जिस मोड़ से गुजरो उसी की पहचान बनो

ख़्वाबों में आशाओं के रंग बिखरने दो
खुले नयनों में आकाश सिमटने दो
बना ली बहुत सिमाएँ चारों ओर
कल्पनाओं को उन्मुक्त उड़ान अब भरने दो।।

निराशा हताशा की चिता सजने दो
तन्हाई को मौन संगीत से भरने दो
अद्भुत सौंदर्य दिखेगा हर तरफ़
इक बार अंदर की गागर तो छलकने दो।।

क्यों ज़िंदगी को अपने से बिछड़ने देते हो
बाहरी चकाचौंध में पागल बन भटकने देते हो
भीतर ही हैं खुली हुई मधुशाला
क्यों नहीं इसी में खुद को बहकने देते हो।।

खुद से खुद को ज़रा बात करने दो
सुप्त ऊर्जा को ज़रा वात बन बहाने दो
मत रोको अपने बचपन को
खुल के हँसों ज़रा उत्पात होने दो।।

फरारी से द्रुत मन के सवार बनो
अट्टालिका में रहकर भी हिम का आकार बनो
जीवन को कर लो इतना उन्नत तेजस्वित
जिस मोड़ से गुज‍रो उसी की पहचान बनो।।

24 दिसंबर 2007
 

प्रतीक्षा के पल फिर कहाँ किस ओर

जहाँ भी देखूँ तुम्हीं हो हर ओर
प्रतीक्षा के पल फिर कहाँ किस ओर।।

चेहरे पर अरुणाई-सी खिल जाती
धड़कनें स्पंदन बन मचल जाती
यादों की बारिश में नाचे मन मोर।।

कब तन्हा जब साथ तुम बन परछाई
साथ देख तुम्हारा खुदा भी माँगे मेरी तनहाई
मेरे हर क्षण को सजाया तुमने चित्त चोर।।

मेरे संग संग चाँद भी करता रहता इंतज़ार
तेरी हर बात को उससे कहा मैंने कितनी बार
फिर भी सुनता मुसकुराकर जब तक न होती भोर।।

तुम्हारे लिए हूँ मैं शायद बहुत दूर
तुम पर पास मेरे जितना आँखों के नूर
मेरी साँसों को बाँधे तेरे स्नेह की डोर।।

24 दिसंबर 2007

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